अखिलेश यादव: क्या 'टीपू' बनेंगे 'सुल्तान'?

मुलायम सिंह यादव परिवार के बच्चों के नाम बहुत दिलचस्प होते हैं, टीपू, तेजू, बिल्लू, सिल्लू, टिल्लू, छोटू और न जाने क्या क्या. आप इनके औपचारिक नाम पूछिए और सीनियर यादव जवाब के लिए बगलें झांकते नज़र आएंगे. इनके ज़्यादातर बच्चों के नाम अ से शुरू होते हैं, अखिलेश, असित, अनुराग, अंकुर वगैरह, वगैरह.

अखिलेश के बेटे का नाम अर्जुन है तो शिवपाल सिंह यादव के बेटों के नाम अंकुर और आदित्य है. एक और दिलचस्प बात ये कि इनमें से अधिकतर का जन्मदिन जुलाई महीने में पड़ता है, इसलिए नहीं कि इनकी पैदाइश इस महीने की है, बल्कि इसलिए कि उत्तर प्रदेश के स्कूलों का पढ़ाई का सत्र इसी महीने से शुरू होता है.

कैसे टीपू बने अखिलेश यादव?
मुलायम सिंह यादव के पारिवारिक दोस्त और उनके पुश्तैनी सैफ़ई गाँव के ग्राम प्रधान दर्शन सिंह ने उनके बेटे का नाम टीपू रखा था. एक बार जब उनका नाम टीपू पड़ गया तो परिवार में किसी ने पंडित बुला कर उनका औपचारिक नामकरण करने की ज़रूरत ही नहीं समझी.

अखिलेश यादव की जीवनी 'अखिलेश यादव - विंड्स ऑफ़ चेंज' लिखने वाली सुनीता एरॉन लिखती हैं, 'जब मुलायम के एक बहुत क़रीबी दोस्त एसएन तिवारी उनके चार साल के बेटे का दाखिला कराने स्कूल ले गए तो वहाँ के अध्यापक ने उनका नाम पूछा. उन्होंने जवाब दिया, 'टीपू.' अध्यापक ने कहा, लेकिन इसको तो फॉर्म में नहीं लिखा जा सकता. तब तिवारी ने हंसते हुए टीपू को कुछ नाम सुझाए और पूछा, 'क्या तुम्हें अखिलेश नाम पसंद है ?' बच्चे ने अपना सिर हिलाया और टीपू अखिलेश यादव हो गए.'

अखिलेश यादव इटावा के सेंट मेरीज़ स्कूल में नर्सरी से कक्षा 3 तक पढ़े. उस ज़माने में उनके चाचा रामपाल सिंह उन्हें साइकिल पर बैठा कर स्कूल लाते थे.

यही साइकिल बाद में समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान बनी. उन दिनों टीपू को पेड़ पर चढ़ने का शौक था.

वो पेड़ से तभी नीचे उतरते थे जब उन्हें कंपट यानी संतरे की टॉफी का लालच दिया जाता था. अखिलेश के पिता मुलायम सिंह उस इलाके के मशहूर पहलवान थे.

उनके गाँव के लोग अभी भी उनके 'चर्खा दाँव' को याद करते हैं जिसमें वो दूसरे पहलवानों को हाथों का इस्तेमाल किया बिना अपने सिर से चित कर देते थे.

1977 में मुलायम सिंह यादव को जब राम नरेश यादव मंत्रिमंडल में सहकारिता मंत्री बनाया गया तो उनकी उम्र 38 साल की थी. इसी उम्र में उनके बेटे अखिलेश यादव नें 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. तब उनके समर्थक हंसते हुए कहा करते थे, 'टीपू बन गया सुल्तान.'

उस समय अखिलेश के लिए 'शिष्ट,' 'विनीत,' 'सभ्य' और 'शरीफ़' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था.

समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता शाहिद सिद्दीकी कहा करते थे, 'समस्या ये थी कि वो इतने शरीफ़ थे कि सरकार चलाना उनके बस की बात नहीं थी.'

जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद का शपथ ली तो राजनीतिक हल्कों में माना जाता था कि सत्ता की असली चाबी तो उनके पिता मुलायम सिंह यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव, राम गोपाल यादव और मुलायम के ख़ासमख़ास आज़म ख़ाँ के पास ही रहेगी.

उनका पाँच साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी राजनीतिक टीकाकारों की उनके बारे में ये धारणा बदली नहीं.

उस ज़माने में उत्तर प्रदेश में ये मज़ाक प्रचलित था कि उत्तर प्रदेश को साढ़े चार मुख्यमंत्री चला रहे हैं. बाद में इस सूची में एक और नाम का इज़ाफ़ा हो गया आईएएस अफ़सर अनीता सिंह का जिनका उत्तर प्रदेश सचिवालय के पंचम तल में ख़ासा रसूख हुआ करता था.

16 सालों के दांपत्य जीवन के बाद मुलायम सिंह यादव और मालती देवी के यहाँ 1973 में अखिलेश का जन्म हुआ था.

मालती शुरू से ही बहुत बीमार रहती थीं और उनको मिर्गी के दौरे आते थे.

बहुत इलाज के बावजूद उनका ये रोग ठीक नहीं हुआ और 25 मई, 2003 को उनका निधन हो गया.

पत्नी मालती के निधन के बाद मुलायम सिंह यादव ने साधना गुप्ता से विवाह किया.

मुलायम के इस रिश्ते को हमेशा छुपा कर रखा गया. लोगों को इसके बारे में पहली बार पता तब चला, जब आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक मुकदमें में मुलायम सिंह यादव ने एक हलफ़नामा दायर किया जिसमें स्वीकार किया गया कि उन्होंने साधना गुप्ता से विवाह किया है.

मुलायम सिंह यादव ने इस संबंध को अपनी पहली पत्नी के निधन के बाद सार्वजनिक किया, हालांकि इससे पहले ही, साधना उनके कालिदास रोड वाले निवास में प्रवेश कर चुकी थीं.

साधना गुप्ता को पहली बार सार्वजनिक रूप से मुलायम सिंह यादव के साथ 1999 में अखिलेश और डिंपल यादव की शादी के समारोह में देखा गया.

साधना की पहले फ़र्रुख़ाबाद के चंद्र प्रकाश गुप्ता से शादी हुई थी. लेकिन ये शादी चली नहीं और उनका 80 के दशक में तलाक हो गया था.

सुनीता एरॉन लिखती हैं, 'मुलायम की दूसरी शादी के दौरान अखिलेश न सिर्फ़ सांसद थे बल्कि उनकी खुद की शादी हो गई थी और उनकी एक बेटी भी थी. अखिलेश कहते हैं कि शुरू में इस संबंध के बारे में मेरा कुछ दुराव था और मैं परेशान भी था लेकिन इस बारे में कभी अपने पिता से नहीं कहा. मुलायम भी स्वीकार करते हैं कि अखिलेश ने इस संबंध पर हमेशा एक उदार रवैया अपनाया है और मेरे दूसरी बार शादी करने के फ़ैसले का सम्मान किया है. '

अपने एक मित्र अवध किशोर बाजपेई की सलाह पर मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को पढ़ने के लिए ढोलपुर के सैनिक स्कूल भेज दिया.

उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव उनका दाखिला कराने उनके साथ वहाँ गए. अखिलेश के सैनिक स्कूल प्रवास के दौरान मुलायम उनसे मिलने सिर्फ़ दो बार गए.

उन्होंने एक बार उन्हें पत्र लिखा, जिसे पत्र न कह कर एक टेलिग्राम कहा जा सकता है. उस पत्र में सिर्फ़ दो वाक्य थे- 'पढ़ने में मेहनत करो. काम आएगा.'

सैनिक स्कूल में अखिलेश दूसरे लड़को की तरह अपने कपड़े खुद धोते थे और अपने जूते भी स्वयं पॉलिश करते थे.

छात्रों से अपेक्षा की जाती थी कि वो दिन में कम से कम 8 किलोमीटर चलें. ढोलपुर से अखिलेश इंजीनयरिंग की पढ़ाई के लिए मैसूर चले गए. इस बार उनका दाखिला कराने मुलायम सिंह यादव के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा गए.

ये वहीं नृपेंद्र मिश्रा हैं जो इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव हैं.

मैसूर के जयचमरेंद्र इंजीनयरिंग कालेज में पढ़ाई के दौरान उनकी दोस्ती मशहूर तेज़ गेंदबाज़ जवागल श्रीनाथ से हो गई. जब 1996 में वो इंजीनयर बन कर लौटे तो मुलायम सिंह यादव देवेगौड़ा मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री थे.

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