ऑटोमेटिक टॉयलेट और वाटर एटीएम से स्मार्ट बनते स्लम

शहरीकरण की वजह से दुनिया भर के शहरों में स्लम (झुग्गी-झोपड़ियों वाली बस्तियां) तेज़ी से फैल रही हैं. माना जाता है कि आज दुनिया की एक अरब आबादी झुग्गियों मे रहती है और इनकी हालत बेहद ख़राब है.

जाने-माने लेखक चार्ल्स डिकेंस ने न्यूयॉर्क के मशहूर या यूं कहें कि बदनाम झुग्गी 'फ़ाइव प्वाइंट्स' के बारे में लिखा था कि, 'ये एक तरह का चौकोर मकानों का कोण है.' ये बात 1842 की है, तब फ़ाइव प्वाइंट्स की झुग्गी बीमारियों, जुर्म और न जाने कितनी बुराइयों का अड्डा मानी जाती थी. बाद में उस बस्ती को नेस्तनाबूद कर दिया गया. आज उसकी जगह न्यूयॉर्क के बेहद महंगे मकान बना दिए गए हैं.

जब से दुनिया में शहरीकरण बढ़ा, तब से इनसे निपटने का एक ही तरीक़ा आज़माया जाता रहा है, वो है इनको उजाड़ना और इनकी जगह बेहतर सुविधाएं या मकान बनाना. जैसे कि फ़ाइव प्वाइंट्स स्लम की जगह पार्क, सरकारी इमारतें और निजी मकान बना दिए गए.

पढ़ें- झुग्गी के बच्चों को संगीत सीखा रहे हैं रहमान

वैसे, इन झुग्गियों के उजाड़ने से किसी को क्या दिक़्क़त होगी. लेकिन, स्लम से निपटने के इस तरीक़ों से एक बड़ा सवाल उठता है, वो ये कि इन बस्तियों में रहने वाले कहां जाएंगे?

न्यूयॉर्क की झुग्गी 'फ़ाइव प्वाइंट्स' से जब हज़ारों झुग्गियां उजाड़ी गईं, तो उनकी जगह अदालत की इमारतें और पार्क बना दिए गए. लेकिन, सरकार के इस क़दम से उज़ड़े लोगों के लिए कोई योजना ही नहीं थी.

जिस तरह से आज लोग शहरों की तरफ़ भाग रहे हैं और जलवायु परिवर्तन की वजह से भगदड़ मची है, उससे तय है कि दुनिया में झुग्गी-बस्तियों की तादाद बढ़ेगी.

हाल ही में अफ्रीकी देश कीनिया के सबसे बड़े स्लम एरिया किबेरा को उजाड़ दिया गया. इससे 20 हज़ार लोग बेघर हो गए.

अब हर झुग्गी बस्ती को उजाड़ा तो नहीं जा सकता. फिर, इनमें आबाद लोगों को बेहतर ज़िंदगी देने का तरीक़ा क्या है?

ऐसे में अब झुग्गियों को ही बेहतर बनाने का नया दौर है. दुनिया के कई शहरों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, जिनसे झुग्गियों में रहने वालों की ज़िंदगी को बेहतर बनाया जा रहा है.

झुग्गी बस्तियों में सड़कें बनाई जा रही हैं. पीने के पानी की पाइपलाइन बिछाई जा रही है. मज़बूत मकान बनाए जा रहे हैं. लोगों को अपने मकान बनाने की इजाज़त दी जा रही है. उनकी बीमारियों के इलाज के लिए बेहतर सुविधाएं स्लम तक पहुंचाई जा रही हैं. इन तरीक़ों से झुग्गियों को आज किसी दूसरी बस्ती जैसा बनाने की कोशिश की जा रही है.

ब्रिटेन की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी में शहरीकरण की एक्सपर्ट डायना मिटलिन कहती हैं कि, 'स्लम असुरक्षित और अस्थायी ज़िंदगी के प्रतीक हैं. लेकिन, उनमें ज़िंदगी स्थायी रूप से आबाद रहती है. बहुत से लोग ऐसे हैं जो 40 बरस से स्लम में रहते आए हैं. ऐसे में आज ये सोच उभरी है कि हमें उनकी मदद करनी चाहिए.'

ये दान से कल्याण का मामला नहीं है. झुग्गियों में रहने वाले लोग ग़रीब भले हों, मगर उनसे भी कुछ कमाई हो सकती है. आख़िर आज दुनिया का हर सातवां इंसान झुग्गियों का बाशिंदा है. अब कारोबार जगत के कई लोग झुग्गियों में रहने वालों की ज़िंदगी बेहतर बनाने में अपने लिए मुनाफ़ा तलाश रहे हैं.

पढ़ें- झुग्गी के जीवन में रंग भरती कला

अब शौचालय को ही ले लीजिए. आम तौर पर किसी भी झुग्गी बस्ती के साथ बड़ी चुनौती ये होती है कि वो शहरों की बुनियादी सुविधाओं से वंचित होती हैं. वहां, सीवर लाइन नहीं होती. पीने के पानी की लाइन नहीं होती. बिजली के तार नहीं पहुंचे होते.

ऑटोमेटिक टॉयलेट की एक नई कोशिश

मुंबई के मयंक मिढा झुग्गियों में ही पले बढ़े. मयंक कहते हैं कि, 'झुग्गियों में बड़े होते हुए मैंने शौचालयों की भारी कमी देखी है.' मयंक शुरू से इसे बदलने के लिए कुछ करना चाहते थे. उन्हें एक मौक़ा साल 2014 में मिला. इस वक्त वो एक टेलीकॉम कंपनी में काम कर रहे थे. एक दिन काम करते हुए उनकी नज़र एक टॉवर के नीचे लगने वाले मेटल बॉक्स पर पड़ी. उन्हें लगा कि ये तो शानदार शौचालय का काम कर सकता है.

Comments

Popular posts from this blog

कुछ चीज़ें हम क्यों भूल जाते हैं, जबकि कुछ हमेशा याद रहती हैं

肺炎疫情:居家隔离期间遭受孩子暴力对待的父母

ЦБ раскритиковал проект закона о переносе арбитражных